हमारी लोक-परंपरा में रामदेवजी एक ऐसे नायक हैं, जिन्होंने समाज के विभाजन को रोकने के लिए बड़ा काम किया बल्कि स्वयं को आहूत भी कर दिया। यह दीगर है कि इनकी मान्यता 'देवत्व' के अधीन रही, लेकिन तत्कालीन समाज में इन्होंने जो कुछ भी किया, उसे समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए था।
ऐसा हुआ नहीं!
और ऐसा नहीं होने से तत्कालीन राजपूताना में अस्पृश्यता के विरुद्ध जागरण के इतिहास को जानने की एक बड़ी कड़ी टूट गई। अगर रामदेवजी का इस रूप में अध्ययन करते तो पता चलता कि उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा कैसे मिली, तो संभव है कि उनके मन में करुणा जगाने वाले का भी पता चलता। कड़ी से कड़ी जुड़ती। उनके संकल्प को अभियान बनाने वालों का भी पता चलता, लेकिन यह सब उन्हें देवता बनाए जाने की प्रक्रिया में कहीं ओझल हो गया।
बेशक, आज वे आस्था के बड़े केंद्र हैं। मेरे घर भी चूरमा-चिटकी का प्रसाद उन्हें चढ़ाया गया है, लेकिन उन्होंने जैसा चाहा, वैसा समाज बनाने की दिशा में रामदेवजी के बाद शायद ही कोई चला हो। उनका समाज समन्वय-मूलक था। जातियों के जंजाल से मुक्त। ऊंच-नीच की पहचान से मुक्त। परस्पर सम्मान और करुणा का संदेश देने वाले इस लोक-नायक की पूजा नहीं होती चाहे, लेकिन कहा मान लिया जाता तो आस राजनेताओं के हाथों हम खिलौने नहीं होते।
रामदेव के समाज की स्थापना तो किसी अकेले के वश की बात नहीं है, लेकिन मैं चाहता हूं ऐसा हो। लोक-नायकों की शृंखला में सबसे अधिक प्रभावित करने वाले रामदेवजी के देखे सपने के समाज की संकल्पना के हेतु मैं अपने स्तर पर कृत-संकल्पित हूं...
#हरीश_बी_शर्मा
No comments:
Post a Comment