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Monday, September 21, 2026

लोक-नायक राम-सा : एक प्रगतिशील बाबा, एक अलौकिक पीर


- हरीश बी. शर्मा
राजपूताने की लोक-परंपरा में रामदेवजी एक ऐसे नायक हैं, जिन्होंने समाज के विभाजन को रोकने के लिए बड़ा काम किया बल्कि स्वयं को आहूत भी कर दिया। उनका आविर्भाव काल विक्रम संवत 1461 से 1465 के बीच माना जा सकता है, सीधी बात करें तो आज से साढ़े छह सौ साल वर्ष से भी पहले की बात है, जब रामदेव नाम के व्यक्तित्व ने आने वाले वक्त की नब्ज को पकड़कर अछूतोद्धार के लिए खुद को होम दिया। वह समय कितना क्रूर और अंधविश्वासी रहा होगा कि लोग समंदर पार करना भी पाप समझते थे। ऐसे समय में महाजनों को विदेश जाने के लिए प्रेरित किया। इससे बड़ी प्रगतिशीलता का क्या उदाहरण हो सकता है। आदिवासी और पिछड़ी जातियों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए जो जतन किये, उनके लिए रामदेवजी को किसी ने प्रेरित नहीं किया, क्योंकि अंग्रेज तो रामदेवजी के बहुत बाद भारत में आए थे, जिन्होंने कुछ समाजसेवियों को इस तरह के कामों के लिए तैयार किया, लेकिन समय की नब्ज को तो रामदेवजी ने बहुत ही पहले पकड़ लिया और अपने काम में लग गये।

क्या इस रूप में देखा है आपने रामदेवजी को?

सारा देश आज बाबा रामदेव का भक्त है। कोई उन्हें श्रीकृष्ण का रूप मानते हुए अवतार बताता है तो कोई देवता या बाबा और हां, पीर भी। साम्प्रदायिक सद्भाव का जो कार्य बाबा रामदेव ने किया, अप्रतिम है। लेकिन, अफसोस इस बात का है कि लोकनायक बाबा रामदेव का यह स्वरूप उनके देवत्व के सामने कहीं तिरोहित हो जाता है।

क्या आप जानते हैं कि अंग्रेजों और उनके बनाए समाजसेवियों से पहले ही रामदेव जी ने तय कर लिया था पिछड़ों को आगे लाना?

यह बड़ा सवाल है कि बाबा रामदेव का पिछड़ी जातियों को मुख्यधारा में लाने का काम पाठ्यक्रमों में क्यों नहीं बनता जबकि इतिहास साक्षी है कि रामदेव के विचार को तत्कालीन समाज ने न सिर्फ स्वीकार किया था बल्कि अंगीकार भी किया था।
हालांकि समाज में इनकी मान्यता 'देवत्व' के अधीन रही, लेकिन तत्कालीन समाज में इन्होंने जो कुछ भी किया, उसे समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए था। ऐसा नहीं होने से तत्कालीन राजपूताना में अस्पृश्यता के विरुद्ध जागरण के इतिहास को जानने की एक बड़ी कड़ी टूट गई। अगर रामदेवजी का इस रूप में अध्ययन करते तो पता चलता कि उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा कैसे मिली, तो संभव है कि उनके मन में करुणा जगाने वाले का भी पता चलता। कड़ी से कड़ी जुड़ती। उनके संकल्प को अभियान बनाने वालों का भी पता चलता, लेकिन यह सब उन्हें देवता बनाए जाने की प्रक्रिया में कहीं ओझल हो गया।  

क्यों एक लोकनायक को बनाना चाहते हैं देवता?

हमारे लोक-नायकों के साथ इस तरह के कईं हादसे हुए हैं। उन्हें मान्यता तो मिली है, लेकिन सामाजिक नहीं बल्कि धार्मिक। संभव है कि तत्कालीन राजसत्ताओं ने इन्हें देवता बनाकर समाज के सोचने की शक्ति को धर्म के हवाले कर दिया हो। आविर्भाव काल से समाधिस्थ होने तक और समाधि के बाद भी उनके चमत्कारों की चर्चा जगह-जगह होती है। आज भी हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मद्रास, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र आदि में उनके प्रति भक्ति का भाव हिलोरे लेता है। रुणीचा यानी रामदेवरा में उनके दर्शन करने के लिए सामान्य दिनों में भी कतारें लगती हैं। मेले के दौरान तो दर्शनार्थियों का सैलाब उमड़ता है।

सिर्फ आस्था का केंद्र हैं रामदेव जी या चेतना का स्वर?

आज भी उनकी जोत सभी प्रकार की परेशानियों के निवारण का साधन माना जाता है, तो यह विश्वास का चरम है। उनके नाम की आंण ली जाती है यानी सौगंध। सच और झूठ को समझने के लिए ली जाने वाली रामदेवजी की सौगंध कालांतर में मनौतियों के भी ली जाने लगी है। ऐसा करने वालों में रामदेवजी कितने गहरे बैठे हैं, यह समझने की बात है।
बेशक, आज वे आस्था के बड़े केंद्र हैं। लोग उन्हें मानते हैं, लेकिन उन्होंने जैसा चाहा, वैसा समाज बनाने की दिशा में रामदेवजी के बाद शायद ही कोई चला हो। उनका समाज समन्वय-मूलक था। जातियों के जंजाल से मुक्त। ऊंच-नीच की पहचान से मुक्त। परस्पर सम्मान और करुणा का संदेश देने वाले इस लोक-नायक की पूजा नहीं होती चाहे, लेकिन कहा मान लिया जाता तो आस राजनेताओं के हाथों हम खिलौने नहीं होते।

क्या हम चल रहे हैं रामदेव की राह?

देश के लोक-नायकों की शृंखला में सबसे अधिक प्रभावित करने वाले रामदेवजी के देखे सपने के समाज की संकल्पना के लिए प्रयासों की जरूरत है। उनके संबंध में लोक में फैली कहानियां और कथाएं तो सुनाने के लिए कईं कथावाचक आ जाएंगे। उनकी बाणियां, भजन, पद और गीतों का बड़ा खजाना मिल सकता है, जिसमें रामदेवजी के अलौकिक जीवन का दर्शन हो सकता है, लेकिन उस लोक का क्या होगा, जिसके लिए उनका आविर्भाव हुआ था।

काहे का विवाद, उनके विजन को समझें?
 
संभव है उनके जन्म और जन्मतिथि के संबंध में संदेह हो। पहली बार थोड़े ही हुआ है। इससे पहले भी समाज का उद्धार करने आने वालों के संबंध में भी इस तरह की तथ्यात्मकता को लेकर सवाल-संदेह किये गए हैं। अब अगर इतिहास लेखन परंपरा को हम आरोपित भी करेंगे तो क्या हो जाएगा। फिर अगर इन सभी बातों पर हम बहस करेंगे तो अवतार परंपरा में आने वाले तमान सिद्ध औ अलौकिकों के संबंध में नये सिरे से खोजना होगा।
सवाल तो 'संभवामि युगे-युगे' का है। रामदेव आए और उन्होंने अगर अपने समाज को बदलने की ठानी और अविचल अपने कार्य में लगे रहे और फिर एक समय आने पर अपना प्रस्थान स्वयं ने चुना तो कुछ तो था ऐसा जो उन्हें भिन्न करता है।
जरूरत है इस तरह के विवादों से दूर होते हुए रामदेव के तत्कालीन समाज को दिए योगदान को रेखांकित किया जाए। प्रो.डॉ.सोनाराम चौधरी की इस विषय पर लिखी किताब  'बाबा रामदेव : इतिहास एवं साहित्य' एक प्रामाणिक ग्रंथ है, जिसे राजस्थानी ग्रंथागार ने प्रकाशित किया है। हालांकि, यह सोनाराम जी का शोध है, लेकिन आधारभूत जानकारियां काफी हैं, जिसके आधार पर अध्ययन को आगे बढ़ाया जा सकता है।

ऐसे में जरूरत है कि अजमलजी कौन थे?
डाली बाई कहां से आई?
हरजी भाटी चंवर क्यों चंवर ढुलाते रह गये? 
जैसे सवालों में उलझने की बजाय हम रामदेव जी की उस अंतश्चेतना को जानने का प्रयास करें, जिसके दम पर उन्होंने अपने समय के घोर विषम समय में समाज के दबे-कुचलों को अंधेरे से निकालकर मुख्यधारा में शामिल करने का बीड़ा उठाया। 

क्या वह उनके गुरु बलिनाथ थे? 
क्या इस संबंध में पांच पीरों ने उन्हें प्रेरित किया?
क्या वे वाकई किसी प्रयोजनवश यहां आए थे? 
जैसे कभी रामचंद्र आए थे?
कभी कृष्ण आए थे?

हरजी भाटी तो अपने पद में उन्हें और भी कई अवतारों से जोड़ते हैं। ऐसा हो भी सकता है कि हमें तत्कालीन समय के ऐसे अनेक तथ्य मिल जाए जो सोचने और समझने के लिए नई राह खोलें, लेकिन खोलनी तो होगी। अगर हमने अपने लोक-नायकों को देवता बनाकर छोड़ दिया तो हम अपने सामाजिक इतिहास का बहुत बड़ा नुकसान करने के अपराधी बनेंगे। 
फिलहाल उनके लिए एक संबोधन बहुत ही प्यारा है-रामसा। राजस्थान में सा शब्द आदरसूचक है। हिंदी में इसका प्रयोग जैसा के लिए भी होता है। इस रूप में कितनी सुंदर अभिव्यंजना होती है-राम-सा...
और उनकी खमा जब हम करते हैं तो आकाश सा अस्तित्व मानते हैं।

-हरीश बी.शर्मा
#हरीश_बी_शर्मा
Hariish B. Sharma

Sunday, September 13, 2026

लोकनायक हैं बाबा रामदेव रुणीचा वाले

हमारी लोक-परंपरा में रामदेवजी एक ऐसे नायक हैं, जिन्होंने समाज के विभाजन को रोकने के लिए बड़ा काम किया बल्कि स्वयं को आहूत भी कर दिया। यह दीगर है कि इनकी मान्यता 'देवत्व' के अधीन रही, लेकिन तत्कालीन समाज में इन्होंने जो कुछ भी किया, उसे समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए था। 
ऐसा हुआ नहीं! 
और ऐसा नहीं होने से तत्कालीन राजपूताना में अस्पृश्यता के विरुद्ध जागरण के इतिहास को जानने की एक बड़ी कड़ी टूट गई। अगर रामदेवजी का इस रूप में अध्ययन करते तो पता चलता कि उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा कैसे मिली, तो संभव है कि उनके मन में करुणा जगाने वाले का भी पता चलता। कड़ी से कड़ी जुड़ती। उनके संकल्प को अभियान बनाने वालों का भी पता चलता, लेकिन यह सब उन्हें देवता बनाए जाने की प्रक्रिया में कहीं ओझल हो गया।  

बेशक, आज वे आस्था के बड़े केंद्र हैं। मेरे घर भी चूरमा-चिटकी का प्रसाद उन्हें चढ़ाया गया है, लेकिन उन्होंने जैसा चाहा, वैसा समाज बनाने की दिशा में रामदेवजी के बाद शायद ही कोई चला हो। उनका समाज समन्वय-मूलक था। जातियों के जंजाल से मुक्त। ऊंच-नीच की पहचान से मुक्त। परस्पर सम्मान और करुणा का संदेश देने वाले इस लोक-नायक की पूजा नहीं होती चाहे, लेकिन कहा मान लिया जाता तो आस राजनेताओं के हाथों हम खिलौने नहीं होते।

रामदेव के समाज की स्थापना तो किसी अकेले के वश की बात नहीं है, लेकिन मैं चाहता हूं ऐसा हो। लोक-नायकों की शृंखला में सबसे अधिक प्रभावित करने वाले रामदेवजी के देखे सपने के समाज की संकल्पना के हेतु मैं अपने स्तर पर कृत-संकल्पित हूं...
 #हरीश_बी_शर्मा

Sunday, October 16, 2011

मुझे लौटना है

मुझे लौटना है
बिल्कुल
तय है लौटना
लेकिन
तुम्हारे पास नहीं
हां, तुम्हारे पास भी नहीं
बिल्कुल नहीं क्योंकि तुम नाम हो
अब मुझे नहीं चाहिए कोई भी नाम
पहचान
जगह
संज्ञा
नहीं चाहिए सर्वनाम
कोई विशेषण
...
यहां तक लौटने की चाहत
खत्म हो रही है मेरी
या के घुटन होने लगी है यहां
या के अब और पाना चाहता हूं
है...! कोई है?
दे सकते हो तुम?
तुम...?
हां, बोलो तुम भी...?
कोई भी... जो सक्षम हो!
बोलो-बोलो-कोई तो हो
देह न अदेह
प्राण से परे
जीवात्मा न परमात्मा
सब भटक रहे हो-मुक्ति के लिए
तुम लोगों से-मुझे क्या मिलेगा बोलो
बोलो-मुझे क्या दोगे?
अब तक मेरी और तेरी चाहतों में
फर्क ही क्या रहा जो
सुकून की आस करुं तुझसे?
या के तुम मुझसे राहत पाओ!
छोड़ो भी सब, छोड़ो भी अब
तुम अपनी जानो-जाना है तो जाओ
वरना लौट जाओ
मुझे जाना है
लौटना है, लौटना है, लौटना है
बस! याद रखना मेरे पीछे आने से भी कुछ ना मिलेगा
आज तक अनुयायियों को संप्रदाय ही चलाने पड़े हैं
सब कुछ जानते अपने देवताओं के झूठ-सच
निभाने पड़े हैं-मंत्र
होमनी पड़ी है आस्थाएं
तुम ऐसा मत करना
मेरे कहे का संप्रदाय मत बनाना
मेरे से आस्था मत जोडऩा
जो खुद को ही नहीं ढूंढ़ पाया
बहुत पहले ही हो चुका है तुम्हारे सामने नंगा
सनद रहे-यह नग्नता साधना नहीं है
तुम भ्रम में मत पडऩा
मैं जानता हूं तुम भ्रम में नहीं, कौतुहल में हो
जानना चाहते हो
मैं
ऐसा हूं या वैसा
मिलेगा जवाब
मैं आऊंगा-बताने
इसीलिए लौटना है मुझे
मांगना है जवाब
दिग से, दिगंत से
मेरे होने के कारक बने उन सभी से
जो कर रहे हैं मेरा इंतजार
मैं जानता हूं
वे बेहद खुश होंगे
वे बुला रहे हैं
तुम इसे मेरी तरह लौटना ही कहना
वे भी इसे लौटना ही समझें तो बेहतर
सुना है
लौटने का कहकर निकले बहुतेरे
आज तक उन तक पहुंचे नहीं हैं
मुझे लौटना है
मुझे लौटना है
मुझे लौटना है

- हरीश बी. शर्मा

Wednesday, May 18, 2011

कभी संवेदन, कभी स्पंदन, कभी आमंत्रण, कभी अनदेखी

वह लगे सुहानी बरखा सी
सूखे मरु को है सरसाती
कभी संवेदन, कभी स्पंदन
कभी आमंत्रण, कभी अनदेखी

वो प्रणय कवि की ज्यों पंक्ति
वह कशिश गजल का मतला ज्यूं
वह छुअन बहारों की समीरा
वह लाज उदित होते रवि की
वह छन-छन पायल की भाषा
वह हंसी कहीं बिजली चमकी
कभी संवेदन, कभी स्पंदन, कभी आमंत्रण, कभी अनदेखी

वह घनश्यामल बिखरी जुल्फें
वह दीपशिखा मद्धिम-मद्धिम
वह बंदनवार बहारों की
वह चरम बसंती पुरवाई
वह लय है गीतों की मेरे
वह वीणा मेरी वाणी की
कभी संवेदन, कभी स्पंदन, कभी आमंत्रण, कभी अनदेखी

वह दिल में बसी प्यारी मूरत
वह जिसे सजाया ख्वाबों में
वह झील-सी गहराई जिसमें
हम डूबते ही हर बार चले
वह खिलता कमल, सिमटी दुल्हन
वह तुलसी मेरे अंगना की
कभी संवेदन, कभी स्पंदन, कभी आमंत्रण, कभी अनदेखी

- हरीश बी. शर्मा

Thursday, April 28, 2011

तब तक



तूने जब सेंध लगाई
छैनी से भी पहले
आंगन में फैल गई
तेरी रोशनाई
रेत, किरचें और उधर से आती किरण
हां, सूरज तेरा-मेरा अलग नहीं था
किरचें और रेत थी मेरी
मेरी दीवार से
फिर जाने क्यों लगता रहा जैसे
सब कुछ था प्रेरित-अभिप्रेरित
उधर से, तेरी ओर से
छैनी करती रही सूराख
टकराया तेरा होना
तेरे होने का अहसास
अलग था कुछ-अब तक अनदेखा
वजूद जो चाहता था चुरा लेना
मैं निश्चित, आश्वस्त! 
क्या?
था क्या मेरे पास
चुराने लायक?
मैं भी समेट कर घुटने
टेक कर पीठ दीवार से
करने लगा इंतजार
चलती रही हथौड़ी
पिटती रही छैनी
बढऩे लगा आकार
सब कुछ दिखने लगा आरपार
मेरा बहुत कुछ जा चुका था उधर

- हरीश बी. शर्मा

Friday, April 1, 2011

रंगकर्म: बस यूं ही लिखने लगा नाटक

राजस्थान साहित्य अकादमी की ओर से नाट्य विधा के लिए दिए जाने वाले देवीलाल सामर पुरस्कार के लिए मुझे चुने जाने पर मेरे कुछ मित्रों ने मेरे नाटक और सृजन प्रक्रिया के संबंध में जानना चाहा है, उनके प्रश्नों से उपजी यह अनुभूति यहां शेयर कर रहा हूं। 
बीकानेर में उन दिनों नाटकों की जबर्दस्त मार्केटिंग होती थी। फिल्मों के पोस्टर की तरह पोस्टर लगते थे। बस, ये पोस्टर हाथ से बने होते थे। आकर्षण पैदा हुआ। नाटक में रोल पाना चाहता था लेकिन 'थैंक यू मिस्टर ग्लाडÓ में मधु आचार्य जी की धुआंधार रिहर्सल ने अंदर तक हिला रखा था। फिर भी स्कूल-कॉलेज तक छिटपुट नाटक करता रहा। स्वदेश दीपक के 'कोर्टमार्शलÓ के जरिये पहली बार स्टेज का स्पर्श किया। यह समय था जब जवाहर कला केंद्र ने संभागीय नाट्य प्रतियोगिता शुरू हुई। यह बात 1995 के आसपास की है। इस प्रतियोगिता के दौरान स्क्रिप्ट की समस्या एक मुद्दा बन गई। वरिष्ठ रंगकर्मी प्रदीप भटनागर, जगदीशसिंह राठौड़, रामचंद्र शर्मा 'अनिशाÓ ने कहा कि तुम स्क्रिप्ट क्यों नहीं लिखते। इसी बीच आकाशवाणी के जोधपुर में होने वाले यूथ फेस्टीवल के लिए योगेश्वर नारायण शर्मा ने 'वाह रे देश के कर्णधारÓ स्क्रिप्ट हम से लिखवा ली। यहां हम से आशय मैं और डॉ.कुमार गणेश हैं। इसे हमने लिखा भी और अभिनय भी किया। हां, आकाशवाणी का यह कार्यक्रम ही ऐसा था कि नाटकों का मंचन हुआ और लाइव-प्रसारण भी।
इस के बाद तो जैसे सिलसिला शुरू हो ही गया। नाटक लिखे तो पुरस्कृत हुए। मंचन भी हुआ। इसी दौरान राजस्थान साहित्य अकादमी ने हिंदी नाट्य सृजन तीर्थ किया। यहां भी नाटक का चयन हुआ। मंचन होते रहे और इस तरह हम पूरी तरह से नाटक के हो गए। हमें रंग-लेखक बनाने में जवाहर कला केंद्र की लघु नाट्य लेखन प्रतियोगिता का बहुत बड़ा योगदान रहा। आज इस बात का संतोष है कि 15 साल पहले जहां स्क्रिप्ट की कमी की बात होती थी, वह काफी हद तक कम हो गई है।
मेरा सौभाग्य है कि लक्ष्मीनारायण सोनी, सुरेश हिंदुस्तानी, सुधेश व्यास, दलीपसिंह भाटी, दिनेश प्रधान, विपिन पुरोहित, अभिषेक गोस्वामी, रामसहाय हर्ष, रामचंद्र शर्मा, सुकांत किराड़ू, मयंक सोनी, सुरेश पाईवाल, मनजीत मन्ना ने मेरे लिखे नाटकों का निर्देशन किया। इस तरह 'सलीबों पर लटके सुखÓ, 'पनडुब्बीÓ, 'भोज बावळौ मीरां बोलैÓ, 'देवताÓ, 'कठफोड़ाÓ, 'एक्सचेंजÓ, 'हरारतÓ, 'जगलरीÓ, 'एलओसी:लाइन ऑफ कंट्रोलÓ, 'प्रारंभकÓ, 'सराबÓ, 'गोपीचंद की नावÓ 'ऐसो चतुर सुजानÓ नाटकों का मंचन हुआ। 'हरारतÓ और 'पनडुब्बीÓ के दो मंचन हो चुके और 'सराबÓ को सिंधी में अनुदित करके मंचित किया गया।
इसके अतिरिक्त 'अथवा कथाÓ , 'आंगन भयो बिदेसÓ और हाल ही में लिखा गया नाटक 'ऑनर किलिंग:अस्मिता मेरी भीÓ मंच का परस पाना चाहते हैं। हां, मेरा यह साफ तौर पर मानना है कि मंच का परस मिले बगैर कोई भी आलेख नाटक नहीं हो सकता। मेरे लिए नाटककार होने की एकमात्र यही कसौटी है, यह पहली और आखिरी शर्त।
- हरीश बी. शर्मा

Monday, March 7, 2011

इक नई तुकबंदी! मुलाहिजा फरमाइये...

कितनी होशियारी
कि सबकुछ बचाकर भी
कह जाते हैं लोग
समझाते हैं-यही है दुनियादारी
काश! हमें भी आ जाए ये अय्यारी
कहे तो कहे दिल इसे मक्कारी