- हरीश बी. शर्मा
राजपूताने की लोक-परंपरा में रामदेवजी एक ऐसे नायक हैं, जिन्होंने समाज के विभाजन को रोकने के लिए बड़ा काम किया बल्कि स्वयं को आहूत भी कर दिया। उनका आविर्भाव काल विक्रम संवत 1461 से 1465 के बीच माना जा सकता है, सीधी बात करें तो आज से साढ़े छह सौ साल वर्ष से भी पहले की बात है, जब रामदेव नाम के व्यक्तित्व ने आने वाले वक्त की नब्ज को पकड़कर अछूतोद्धार के लिए खुद को होम दिया। वह समय कितना क्रूर और अंधविश्वासी रहा होगा कि लोग समंदर पार करना भी पाप समझते थे। ऐसे समय में महाजनों को विदेश जाने के लिए प्रेरित किया। इससे बड़ी प्रगतिशीलता का क्या उदाहरण हो सकता है। आदिवासी और पिछड़ी जातियों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए जो जतन किये, उनके लिए रामदेवजी को किसी ने प्रेरित नहीं किया, क्योंकि अंग्रेज तो रामदेवजी के बहुत बाद भारत में आए थे, जिन्होंने कुछ समाजसेवियों को इस तरह के कामों के लिए तैयार किया, लेकिन समय की नब्ज को तो रामदेवजी ने बहुत ही पहले पकड़ लिया और अपने काम में लग गये।
क्या इस रूप में देखा है आपने रामदेवजी को?
सारा देश आज बाबा रामदेव का भक्त है। कोई उन्हें श्रीकृष्ण का रूप मानते हुए अवतार बताता है तो कोई देवता या बाबा और हां, पीर भी। साम्प्रदायिक सद्भाव का जो कार्य बाबा रामदेव ने किया, अप्रतिम है। लेकिन, अफसोस इस बात का है कि लोकनायक बाबा रामदेव का यह स्वरूप उनके देवत्व के सामने कहीं तिरोहित हो जाता है।
क्या आप जानते हैं कि अंग्रेजों और उनके बनाए समाजसेवियों से पहले ही रामदेव जी ने तय कर लिया था पिछड़ों को आगे लाना?
यह बड़ा सवाल है कि बाबा रामदेव का पिछड़ी जातियों को मुख्यधारा में लाने का काम पाठ्यक्रमों में क्यों नहीं बनता जबकि इतिहास साक्षी है कि रामदेव के विचार को तत्कालीन समाज ने न सिर्फ स्वीकार किया था बल्कि अंगीकार भी किया था।
हालांकि समाज में इनकी मान्यता 'देवत्व' के अधीन रही, लेकिन तत्कालीन समाज में इन्होंने जो कुछ भी किया, उसे समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए था। ऐसा नहीं होने से तत्कालीन राजपूताना में अस्पृश्यता के विरुद्ध जागरण के इतिहास को जानने की एक बड़ी कड़ी टूट गई। अगर रामदेवजी का इस रूप में अध्ययन करते तो पता चलता कि उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा कैसे मिली, तो संभव है कि उनके मन में करुणा जगाने वाले का भी पता चलता। कड़ी से कड़ी जुड़ती। उनके संकल्प को अभियान बनाने वालों का भी पता चलता, लेकिन यह सब उन्हें देवता बनाए जाने की प्रक्रिया में कहीं ओझल हो गया।
क्यों एक लोकनायक को बनाना चाहते हैं देवता?
हमारे लोक-नायकों के साथ इस तरह के कईं हादसे हुए हैं। उन्हें मान्यता तो मिली है, लेकिन सामाजिक नहीं बल्कि धार्मिक। संभव है कि तत्कालीन राजसत्ताओं ने इन्हें देवता बनाकर समाज के सोचने की शक्ति को धर्म के हवाले कर दिया हो। आविर्भाव काल से समाधिस्थ होने तक और समाधि के बाद भी उनके चमत्कारों की चर्चा जगह-जगह होती है। आज भी हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मद्रास, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र आदि में उनके प्रति भक्ति का भाव हिलोरे लेता है। रुणीचा यानी रामदेवरा में उनके दर्शन करने के लिए सामान्य दिनों में भी कतारें लगती हैं। मेले के दौरान तो दर्शनार्थियों का सैलाब उमड़ता है।
सिर्फ आस्था का केंद्र हैं रामदेव जी या चेतना का स्वर?
आज भी उनकी जोत सभी प्रकार की परेशानियों के निवारण का साधन माना जाता है, तो यह विश्वास का चरम है। उनके नाम की आंण ली जाती है यानी सौगंध। सच और झूठ को समझने के लिए ली जाने वाली रामदेवजी की सौगंध कालांतर में मनौतियों के भी ली जाने लगी है। ऐसा करने वालों में रामदेवजी कितने गहरे बैठे हैं, यह समझने की बात है।
बेशक, आज वे आस्था के बड़े केंद्र हैं। लोग उन्हें मानते हैं, लेकिन उन्होंने जैसा चाहा, वैसा समाज बनाने की दिशा में रामदेवजी के बाद शायद ही कोई चला हो। उनका समाज समन्वय-मूलक था। जातियों के जंजाल से मुक्त। ऊंच-नीच की पहचान से मुक्त। परस्पर सम्मान और करुणा का संदेश देने वाले इस लोक-नायक की पूजा नहीं होती चाहे, लेकिन कहा मान लिया जाता तो आस राजनेताओं के हाथों हम खिलौने नहीं होते।
क्या हम चल रहे हैं रामदेव की राह?
देश के लोक-नायकों की शृंखला में सबसे अधिक प्रभावित करने वाले रामदेवजी के देखे सपने के समाज की संकल्पना के लिए प्रयासों की जरूरत है। उनके संबंध में लोक में फैली कहानियां और कथाएं तो सुनाने के लिए कईं कथावाचक आ जाएंगे। उनकी बाणियां, भजन, पद और गीतों का बड़ा खजाना मिल सकता है, जिसमें रामदेवजी के अलौकिक जीवन का दर्शन हो सकता है, लेकिन उस लोक का क्या होगा, जिसके लिए उनका आविर्भाव हुआ था।
काहे का विवाद, उनके विजन को समझें?
संभव है उनके जन्म और जन्मतिथि के संबंध में संदेह हो। पहली बार थोड़े ही हुआ है। इससे पहले भी समाज का उद्धार करने आने वालों के संबंध में भी इस तरह की तथ्यात्मकता को लेकर सवाल-संदेह किये गए हैं। अब अगर इतिहास लेखन परंपरा को हम आरोपित भी करेंगे तो क्या हो जाएगा। फिर अगर इन सभी बातों पर हम बहस करेंगे तो अवतार परंपरा में आने वाले तमान सिद्ध औ अलौकिकों के संबंध में नये सिरे से खोजना होगा।
सवाल तो 'संभवामि युगे-युगे' का है। रामदेव आए और उन्होंने अगर अपने समाज को बदलने की ठानी और अविचल अपने कार्य में लगे रहे और फिर एक समय आने पर अपना प्रस्थान स्वयं ने चुना तो कुछ तो था ऐसा जो उन्हें भिन्न करता है।
जरूरत है इस तरह के विवादों से दूर होते हुए रामदेव के तत्कालीन समाज को दिए योगदान को रेखांकित किया जाए। प्रो.डॉ.सोनाराम चौधरी की इस विषय पर लिखी किताब 'बाबा रामदेव : इतिहास एवं साहित्य' एक प्रामाणिक ग्रंथ है, जिसे राजस्थानी ग्रंथागार ने प्रकाशित किया है। हालांकि, यह सोनाराम जी का शोध है, लेकिन आधारभूत जानकारियां काफी हैं, जिसके आधार पर अध्ययन को आगे बढ़ाया जा सकता है।
ऐसे में जरूरत है कि अजमलजी कौन थे?
डाली बाई कहां से आई?
हरजी भाटी चंवर क्यों चंवर ढुलाते रह गये?
जैसे सवालों में उलझने की बजाय हम रामदेव जी की उस अंतश्चेतना को जानने का प्रयास करें, जिसके दम पर उन्होंने अपने समय के घोर विषम समय में समाज के दबे-कुचलों को अंधेरे से निकालकर मुख्यधारा में शामिल करने का बीड़ा उठाया।
क्या वह उनके गुरु बलिनाथ थे?
क्या इस संबंध में पांच पीरों ने उन्हें प्रेरित किया?
क्या वे वाकई किसी प्रयोजनवश यहां आए थे?
जैसे कभी रामचंद्र आए थे?
कभी कृष्ण आए थे?
हरजी भाटी तो अपने पद में उन्हें और भी कई अवतारों से जोड़ते हैं। ऐसा हो भी सकता है कि हमें तत्कालीन समय के ऐसे अनेक तथ्य मिल जाए जो सोचने और समझने के लिए नई राह खोलें, लेकिन खोलनी तो होगी। अगर हमने अपने लोक-नायकों को देवता बनाकर छोड़ दिया तो हम अपने सामाजिक इतिहास का बहुत बड़ा नुकसान करने के अपराधी बनेंगे।
फिलहाल उनके लिए एक संबोधन बहुत ही प्यारा है-रामसा। राजस्थान में सा शब्द आदरसूचक है। हिंदी में इसका प्रयोग जैसा के लिए भी होता है। इस रूप में कितनी सुंदर अभिव्यंजना होती है-राम-सा...
और उनकी खमा जब हम करते हैं तो आकाश सा अस्तित्व मानते हैं।
-हरीश बी.शर्मा
#हरीश_बी_शर्मा
Hariish B. Sharma
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