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Sunday, January 23, 2011

उनके चितराम, मेरी भरी-भरी आंखें

Om Purohit Kagad
'आंख भर चितराम' यह नाम है राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार ओम पुरोहित 'कागद' के कविता संग्रह का। हालांकि कविता से होकर निकलना आसान नहीं है लेकिन अगर कवि 'कागद' हों तो यह हो सकता है। उनकी कविताएं बहुत ही जाने-पहचाने प्रतीक और बिंबों के साथ अपनी बात कहते हुए आगे बढ़ती है लेकिन अचानक ये सारे कुछ और जताने लगते हैं। ओमजी के हाथ में पहुंचने के बाद ये उनके इशारों पर चलने लगते हैं। मुझे नहीं लगता कि किसी ने कालीबंगा सभ्यता के बारे में नहीं पढ़ा हो लेकिन इस संग्रह का एक अध्याय जो पूरी तरह से कालीबंगा पर आधारित है, से निकलने के बाद ही यह तय होता है कि हमने क्या, कितना और कैसे पढ़ा। कोफ्त होती है कि अगर वह इतना अधकचरा था तो क्यों और किसलिए पढ़ा।
इतने सारे विजुअल जो उन्होंने रचे हैं, एक बार पढऩे पर लगता है कि सारे समझ में आ गए हैं लेकिन अगले ही क्षण लगता है कि ओमजी जिस 'अड़वे' की बात कर रहे हैं वो खेत में खड़ा लकड़ी की पिंजर भर नहीं है। उनकी  'खेजड़ी' एक सांस्कृतिक आख्यान लगती है। उनके 'झूठ' सच का अभिप्राय है। 'कालीबंगा' के बहाने तो जैसे उन्होंने मानवीय सभ्यता के सारे मापदंड ही रख दिए हैं।
उनकी कालीबंगा एक ऐसी सृष्टि है, एक ऐसा पड़ाव है जिसे सभ्यता के तौर पर हम जानते-समझते आए हैं। सभ्यता के इस मर्म को ओमजी ने गहरे तक पकड़ा है और फिर आज की हमारी सभ्यता से जोड़कर जो उन्होंने व्यंजना की है, लाजवाब है। हमें 'हम' होने के लिए झकझोरती है। तर्क और संवेदना के साथ वे इतने कपाट खोल देते हैं कि सवाल नत-मस्तक हो जाते हैं।
ऐसे में यह तय है कि पढऩे भर से इन कविताओं तक पहुंचना संभव नहीं है। इसे जानने के लिए राजस्थान में उतरना होगी। धोरों पर दौडऩा होगा और मायड़ भाषा से दीक्षित होना होगा। इस सार्थक लेखन को कोटिश: नमन। मैं चाहता हूं बार-बार पढ़ूं इसे। देखता रहूं आंख भर चितराम। कभी तो समझ आएगा जो ओमजी कहना चाहते हैं।

- हरीश बी. शर्मा

3 comments:

  1. बेजां लिख्यो नीं !
    अब म्हैं कांई बोलूं अर कांईं लिखूं !
    बस.....जय हो !
    सार्थक होग्यो लिखणों !

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  2. बोत आछी लागी आपरी समीक्षा हरीश भाई सा । आपरौ घणो आभार सा ।

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