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Wednesday, July 7, 2010

तुम तो ना हो रेत

रेत के समंदर से निकलने को व्याकुल वो अग्निपिण्ड/
जो फिर रेत को ही तपाएगा/
...और रेत है कि... सहेगी सब/ कहेगी न कुछ/ ...
आखिरकार/ थक कर / वो खुद ही लौट आएगा/
हारा हुआ या के फिर... होने को आतप्त /
जाने कौन भरता है सूरज में इतनी गर्मी?
---एक सुबह जल्दी उठा तो धोरों से निकलते सूरज को देखा - शब्द निकले, सवाल बन गए...

4 comments:

  1. surj me aag barta h harish b. sharma jiske shabdo me kai suraj roshan h

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  2. surj me aag barta h harish b. sharma jiske shabdo me kai suraj roshan h

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