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Saturday, June 5, 2010

न बाहर, न बाद

ढाणियों पर राज को
बांटने समाज को
चलती है तलवारें
रिश्तों की गर्मी पिघल जाती है रोज
खुलते हैं अपने-अपने क्षेत्र
कह दें कुरुक्षेत्र
रचती है महाभारत
पीढ़ियां पढ़ाने के लिए
घड़ दिया जाता है इतिहास
द्रोपदी की लाज, पांडवों का वनवास
कृष्ण का अघोषित रास
आज भी बिकता है।
कृष्ण की गवाही पर पांडव बरी
शकुनि की कोशिशें नाकाम
दुर्योधन बदनाम
त्रियाचरित्र के क्लाईमैक्स के साथ
खत्म होती है महाभारत
सत्यवती से द्रोपदी तक सबूत ही सबूत
महाभारत खत्म होती है
भीष्म को मिलता है
लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
शिखंडी यहां भी नहीं होता है
अन्न के कांसेप्ट पर झुक जाते हैं सबके शीश
फिर कौन पूछे भीष्म से महाभारत का कारण
आज भी छाती ठोककर कहता है वेदव्यास
न जयसंहिता से बाहर, न है कुछ भी इसके बाद
दोहराई जाती है द्रोपदी
सम्मान पाते हैं देवव्रत साहब।

1 comment:

  1. harish ji ki kavita mozoda dur ka aainadar h

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